ख्वाब मुकम्मल करना मेरे तू ..!
आई मौसम में बहार हैं...
दिन तो कट जाता है मेरा सोच सोच में ~
रातो को तेरा इंतज़ार है..
कभी आए जो मेरी याद
देख ही लेना आईना आँख भर
टूटने ना देना ख़ुद को मेरी तरह
मैं तड़पा हूँ तुम्हारे लिए रात भर
रातों को नींद थी
और नींदों में एक ख़्वाब
ख़्वाब में एक पल था
और उस पल में आप
उसी के साथ छूटी मेरी हर एक ख़ुशी की दास्ताँ,
अब तो दुआ भी तन्हा हो गई… और सजदे भी उदासां।
दर्द कम होने लगा आओ कि कुछ रात कटे...!
ग़म की मियाद बढ़ा जाओ कि कुछ रात कटे...!
यूँ तो तुम रौशनी-ए-क़ल्ब ओ नज़र हो लेकिन
आज वो मोजिज़ा दिखलाओ कि कुछ रात कटे...!
हर शाम गुज़र जाती है मेरी यूँ ही
क्या उसको अब मेरा इंतज़ार नहीं
मैं बोला जान सुन तो
वो बोली छोड़ पागल, मुझे अब तुझसे प्यार नहीं
ख़यालों में जो तुम आने लगे हो
क्या ख़ुद से ही ख़ुद को चुराने लगे हो
यूँ तो तुम गुलिस्ताँ-ए-दास्ताँ हो इस जहाँ में
सुना है तुम आँखें देखते हो,
और ग़म बताने लगे हो
मोहब्बत में जो गिरे आशिक
फिर प्रेमिकाओं के ग़ुलाम हुए
मारी जो ठोकर प्रेम ने
फिर कोढ़ी के भाव नीलाम हुए
अकेला हूं पर पहले से थोड़ा समझदार हूं
अब ख्वाबों से नहीं बहकता,
हकीकतों का यार हूं
जो गया, उसका शुक्र है
अब खुद से वफादार हूं
कभी आए जो मेरी याद..!
देख ही लेना आईना आँख भर
टूटने ना देना ख़ुद को मेरी तरह..!
मैं तड़पा हूँ तुम्हारे लिए रात भर
सिर्फ एक तस्वीर के सहारे गुज़ारी हैं सदियां मैंने...
एक तू, जिसने मुझे आँख भर के ताहि देखा...
बस तेरे मुकम्मल ख़्वाबों में आना था मुझे...
एक तू, जिसने कभी सो कर एनएचआई (NHI) देखा...
बस तेरे छोड़ के जाने के डर से
शिकायतों को तेरी, मैंने लफ़्ज़ों तक लाकर नहीं देखा
"तुम" जानती हो मुझे क्या पसंद है..?
"तुम" मुझे पसंद हो...
तुम मुझे पसंद हो क्योंकि तुम भीगी बरसात सी हो...
तुम मुझे पसंद हो क्योंकि तुम खिलते गुलाब सी हो...!
तुम मुझे पसंद हो क्योंकि तुम चांदनी में चमकते चाँद सी हो...
तुम मुझे पसंद हो क्योंकि तुम मेरी रूह की हर एक साँस सी हो...!
तुम मुझे पसंद हो क्योंकि तुम मेरी ख्वाहिशों का एहसास सी हो...
सांसों का राग था, धड़कन का अरमान था,
वो कोई आम नाम नहीं, मेरी रूह का रहमान था।
लब चुप थे, पर आँखों में दास्तान लिखी थी,
उसके जाने के बाद ज़िन्दगी मानो बेवजह सी थी।
वक़्त गुज़रा, पर हर लम्हा उसका मेहमान बना रहा,
मैं चलता रहा... और दिल उसकी यादों का मकान बना रहा।
ना कोई रहमत रही, ना दुआओं में रौशनी थी,
रहमान छूटा तो लगा जैसे ख़ुद से ही जुदाई सी थी।
वो सिर्फ़ एक इंसान नहीं, मेरी ज़िन्दगी का नूर था,
उसकी एक मुस्कराहट — मेरा ग़ुरूर था।
सांसों में सांस न रही,
हाथों में जान न रही,
जम सा गया यह शरीर,
जब सुना—वो मेरी रहमान न रही।
चलता रहा मैं, दिल में लिए उन यादों की तस्वीर को,
जान निकलने लगी… जब यादें भी मेरी मेहमान न रही।
ना था कोई शिकवा, ना थी कोई फ़रियाद ज़ुबां पर,
बस ख़ामोशी थी जो हर पल रोती रही मेरी पहचान पर।
पल-पल चुभता रहा उसके बिना जीने का हर लम्हा,
जैसे सांसें बन गई उसकी ग़ुलाम, और मैं तन्हा...
हर वक्त हर कहीं है
बस वो यहीं नहीं है
डर से डरी डरी है
उसको यक़ीं नहीं है
वो चाहती है अपना हर ग़म कहीं छुपाना
पर राह में खड़ा है गुज़रा हुआ ज़माना
ख़ुद है वो बेख़ुदी में पर जानती है वो उसको
पहचान ख़ुद की गुम है
पर पहचानती है वो उसको
उसने तो खो दिया है
ख़ुद को तो क्या हुआ है
एक अजीब सा उसको अपना मिल गया है
एहसास ऐसा क्यों है
क्या मुझमें ख़ास सा है
या मेरे ख़ालीपन में
कोई अश्क दिख रहा है